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चुनाव आयोग बनाम आई टी इंडस्ट्री

Posted On: 10 May, 2017 Politics में

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‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ अपने देश की एक बहुत पुरानी कहावत है और यह इसलिए क्योंकि हम कई बार अपने देश की उपलब्धियों को नजर अंदाज कर जाते हैं| इस बार बात हो रही है देश के चुनाव आयोग की एक ऐसी उपलब्धि की जिसको देश के लोग समझ नहीं पा रहे हैं| वैसे तो चुनाव आयोग विश्व में सबसे बड़े जनसमूह को लोकतांत्रिक व्यवस्था में ढालने के कार्य में अव्वल है लेकिन यहाँ बात कर रहे हैं उनकी इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन संबंधी उपलब्धि की| समाचार यह है कि हालिया चुनावों के बाद जहां विपक्ष इन वोटिंग मशीनों पर सवाल खड़े कर रहा है वहीं चुनाव आयोग उन आरोपों को सिरे से नकार रहा है| देखने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग का लहजा कुछ ऐसा है मानो वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाना कुछ ऐसा हो जैसे किसी ने गाय के पवित्र होने पर शक कर दिया हो|

बेहद तंग होने के बाद चुनाव आयोग ने कुछ ऐसा ही बयान दिया “पता नहीं क्यों लोग बार-बार हमारी भरोसेमंद मशीनों पर शक करते रहते हैं जबकि कुछ वर्ष पूर्व ही हमने खुला चैलेन्ज दिया था कि दम है तो आइये और इन मशीनों को हैक करके दिखाइए तब तो कोई भी ऐसा नहीं कर के दिखा पाया था|”

आम आदमी और भक्तों को इसके आगे तर्क की कोई गुंजाइश नहीं दिखती लेकिन असल संभावनाएं इसके बाद ही शुरू होती हैं| तकनीकी दृष्टि से देखें तो इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनें भी एक तरह के कम्प्यूटर हैं जो दो भागों से मिल कर बनी हैं – एक उसका दिखने वाला हिस्सा यानी कि हार्डवेयर और दूसरा न दिखने वाला हिस्सा यानी कि सौफ्टवेयर और किसी भी कम्प्यूटर या उस जैसी मशीन को हैक करने में दोनों की भूमिका होती हैं| तकनीकी रूप से समृद्ध कोई व्यक्ति या टीम हार्डवेयर और सौफ्टवेयर की कमियों का लाभ उठाते हुए उसे हैक कर सकता है| लेकिन चुनाव आयोग के दावों के अनुसार उनकी वोटिंग मशीनों में कोई कमी है ही नहीं अतः इसे हैक नहीं किया जा सकता है|

यू-ट्यूब पर उपलब्ध तमाम वीडियो को अगर नजर अंदाज भी कर दें तो बात का सार ये है कि चुनाव आयोग की वोटिंग मशीनें इतनी उत्तम तकनीक का प्रयोग करती हैं की उनमें कोई कमी हो ही नहीं सकती| क्या ऐसा ही कोई दावा आपने कभी विश्व की अन्य प्रसिद्ध कंपनियों से सुना है? कभी माइक्रोसोफ्ट का कोई वक्तव्य आया कि उसका विंडोज सोफ्टवेयर अब हैक प्रूफ है ! या डेल, लेनोवो या तोशिबा ने कभी दावा किया की उनके कम्पयूटर या लैपटॉप हैक-प्रूफ हैं| आजकल समार्टफोन का ज़माना है – क्या आपने कभी एप्पल, सैमसंग या एन्ड्रोएड का वक्तव्य देखा जिसमें कहा गया हो कि अगर किसी में दम है तो हमारा सिस्टम हैक करके दिखाए| मुझे विश्वास है कि आपने कभी नहीं सुना होगा क्योंकि ऐसा दावा तो ये विश्वप्रसिद्ध कम्पनियां भी नहीं कर सकी हैं|

लेकिन हमारा अपना चुनाव आयोग ऐसा दावा कर रहा है और अनाधिकृत सूत्रों से ऐसी खबर है कि इन तमाम कम्पनियों के मालिक चुनाव आयोग से संपर्क करके पूछ रहे हैं कि क्या वो अपनी टेक्नोलोजी उन्हें भी उपलब्ध करा सकते हैं? यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं हैं| हमारा चुनाव आयोग जो कि ठीक से एक आई टी कंपनी भी नहीं है इन तमाम विश्वप्रसिद्ध कंपनियों को ठेंगा दिखाते हुई साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बाजी मार ले गया है| ऐसा सिर्फ एक पीढी की वोटिंग मशीनों के साथ नहीं है| छपा है कि आयोग के पास तीन पीढ़ियों की मशीनें हैं जिनमें से कुछ  मशीनें तो पंद्रह साल से ज्यादा पुरानी हैं और ये सभी मशीन अभेद्य हैं| भई कमाल है |

उधर ये कंपनियां इस बात से परेशान हैं कि चुनाव आयोग ने ऐसी मशीनें कई साल पहले बना ली जिनसे आज तक भी कोई छेड़छाड़ नहीं कर पाया जबकि इन कम्पनियों ने अरबों खरबों डॉलर खर्च करके विशेषज्ञों की फ़ौज पाल रखी है जो उनके उत्पाद को हैक-प्रूफ रख सके| वे बेचारे दिन-रात लगे रहते हैं फिर भी वे ऐसे किसी सिस्टम को कुछ हफ़्तों से ज्यादा हैक-प्रूफ नहीं रख पाते| तभी तो हर कुछ हफ़्तों में विंडोज कहता है कि भाई नए पैचेज डाउनलोड कर लो, तमाम एंटी वाइरस कम्पनियां हर दूसरे चौथे नए सिग्नेचर अपडेट डाउनलोड करने के लिए कहती हैं| एडोबी नाम की कम्पनी का तो पूछो ही नहीं जब भी मैं कम्प्यूटर इस्तेमाल करता हूँ ये लोग मुझे बताते हैं की भाई हमारा जो सौफ्टवेयर आपके पास है अब उसका कोई भरोसा नहीं है भलाई चाहते हो तो नया वर्जन डाल लो|

और इधर हमारा अपना चुनाव आयोग है जिसका असल काम निष्पक्ष चुनाव कराना है उसने थोड़ा समय निकाल कर ऐसे कम्प्यूटर यानी वोटिंग मशीनें बना डाली जिनमें सालों बाद भी लोकतंत्र सुरक्षित है|

केजरीवाल और अन्य विपक्षी दलों के शोर मचाने के बाद चुनाव आयोग ने अपना दावा फिर एक बार दोहराया है कि ठीक है हम तुम्हें फिर से एक बार दो दिन के लिए अपनी मशीनें देंगे अगर दम है तो हैक करके दिखाओ| वैसे यह अभी तय नहीं है की चुनाव आयोग ने ऐसी कोई पेशकश की है या नहीं – कम से कम केजरीवाल साब को तो आधिकारिक प्रेस रिलीज नहीं मिली | आजतक या अन्य किसी चैनल पर खबर चली थी लेकिन आजकल ये सब न्यूज चैनल तेजी में तो अव्वल हैं विश्वसनीयता का कुछ पता नहीं|

तो खैर चुनाव आयोग पूर्व की भांति एक दिन अपने बताए दिन और समय पर कुछ चुने हुए लोगों को अपनी आधुनिकतम वोटिंग मशीनें उपलब्ध कराएगा और विरोधियों को दिए समय में उन्हें हैक करके दिखाना होगा| ऐसा क्यों? अगर मशीनें इतनी ही सुरक्षित हैं तो सीमित समय क्यों? दे दीजिए न महीने भर के लिए? अपनी मशीनें वे एक या दो दिन के लिए दिखाते हैं और विरोधियों से उम्मीद करते हैं की वे उसे तोड़कर दिखाए| लेकिन क्या किसी हैकर को यह मशीनें इससे ज्यादा समय के लिए उपलब्ध नहीं होती होंगी? चार अलग-अलग बटन दबाने पर सभी से कमल की पर्ची निकालने वाले वीडियो को देखने के बाद यह कहना मुश्किल है|

क्या कहा? चुनाव आयोग के पास और भी तो काम हैं और वे केवल हार्डवेयर और सौफ्टवेयर के चक्कर में इतना समय नहीं लगा सकते| यह भी दलील दी जा रही है कि क्या और भी कोई कंपनी ऐसा करती है या  आप बस हमारे चुनाव आयोग के ही पीछे पड़े हैं? सच तो यह है की पारदर्शिता से लोकतंत्र को हमेशा फ़ायदा ही हुआ है और सूचना का अधिकार इसका एक सजीव प्रमाण है|

यदि आपने ओपन सोर्स सौफ्टवेयर का नाम सुना होगा तो यह अवश्य जानते होंगे की इन सौफ्टवेयर का पूरा कोड इंटरनेट पर फ्री उपलब्ध रहता है| कोई भी इन्हें डाउनलोड कर सकता है और उसकी कमियाँ न सिर्फ बता सकता है बल्कि उन्हें सुधार कर दूसरों को भी दे सकता हैं| अपाची नाम का वेब सर्वर सारी दुनिया में प्रयोग होता है और उसका पूरा कोड देखा जा सकता है| क्या इस कदम से उनकी सुरक्षा पर आंच आई ? नहीं, बल्कि स्थिति इससे उलट है कि अपाची इन तमाम लोगों के योगदानों से समृद्ध हुआ है|

इन आई टी कंपनियों की स्थिति इतनी खराब है कि माइक्रोसोफ्ट ने तो अपने सबसे प्रसिद्ध विंडोज एक्स पी से तौबा ही कर ली| उसकी कमियाँ ठीक करते-करते उन्हें पसीना आ गया तो अंत में उन्होंने कहा अब ये ठीक नहीं हो सकता – जा मर| और अपने तमाम ग्राहकों को सूचित कर दिया की अब यह हमसे नहीं होता और आप भी अगर अपनी खैर चाहते हो तो विंडोज 8 या १० पर आ जाओ| हम तो डूबते-डूबते बचे लेकिन अगर तुम नहीं बदले तो यह तुम्हें जरूर डुबा देगा| बताइये कितनी गंभीर समस्या है सौफ्टवेयर को हैक फ्री रखना| और हमारे चुनाव आयोग के पास इसका हल है लेकिन वो बता नहीं रहे हैं – इतना स्वार्थी होना अच्छा नहीं | हमारे चुनाव आयोग को इन तमाम आई टी कंपनियों पर तरस खाना चाहिए और तुरंत उस उत्कृष्ट सौफ्टवेयर का सोर्स कोड पब्लिक के लिए खोल देना चाहिए| जब कोई ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे सौफ्टवेयर को हमेशा के लिए हैक-प्रूफ बनाया जा सकता है तो फिर क्यों उनका तमाम पैसा बरबाद कराया जाए|

मेरा सुझाव है कि चुनाव आयोग को अपनी साख बनाए रखने के लिए वोटिंग मशीनों की निगरानी की श्रृंखला (chain of custody) उनके बनाए जाने की तारीख, बायोस का वर्जन व तारीख, उसमे निहित सौफ्टवेयर का सोर्स कोड, वर्जन एवं हैश कोड सार्वजनिक करना चाहिए| यदि चुनाव आयोग ऐसा करता है तो देश का लोकतंत्र, विश्व एवं सूचना पौद्योगिकी की कम्पनियां हमेशा उसकी ऋणी रहेंगे|

सूचना : लेखक साइबर सुरक्षा का जानकार एवं सूचना पौद्योगिकी क्षेत्र में पच्चीस वर्ष का अनुभव रखता है|


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